(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.272. अध्यायः 272
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिराय निखिलधर्मोपदेशानन्तरं स्वावसानकालाऽऽसत्त्यवगमेन भगवद्ध्यानाय वाक्प्रसारणादुपरते भीष्मे तंप्रति व्यासेन युधिष्ठिरस्थ नगरगमनाभ्यनुज्ञानचोदना॥ 1 ॥ युधिष्ठिरेण भीष्माश्यनुज्ञया सहकृष्णादिभिर्हास्तिनपुरप्रवेशनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच।

शरतल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे।
शयाने वीरशयने पाण्डवैः समुपस्थिते॥ 13-272-1(92263)
युधिष्ठिरो महाप्राज्ञो मम पूर्वपितामहः।
धर्माणामागमं श्रुत्वा विदित्वा सर्वसंशयान्॥ 13-272-2(92264)
दानानां च विधिं श्रुत्वा च्छिन्नधर्मार्थसंशयः।
यदन्यदकरोद्विप्र तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-272-3(92265)
वैशम्पायन उवाच। 13-272-4x(7722)
अभून्मुहूर्तं स्तिमितं सर्वं तद्राजमण्डलम्।
तूष्णींभूते ततस्तस्मिन्पटे चित्रमिवार्पितम्॥ 13-272-4(92266)
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा व्यासःक सत्यवतीसुतः।
नृपं शयानं गाङ्गेयमिदमाह वचस्त्वरन्॥ 13-272-5(92267)
राजन्प्रकृतिमापन्नः कुरुराजो युधिष्ठिरः।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पार्तिवैश्चानुयायिभिः॥ 13-272-6(92268)
उपास्ते त्वां नरव्याघ्र सह कृष्णेन धीमता।
तमिमं पुरयानाय समनुज्ञातुमर्हसि॥ 13-272-7(92269)
एवमुक्तो भगवता व्यासेन पृथिवीपतिः।
युधिष्ठिरं सहामात्यमनुजज्ञे नदीसुतः॥ 13-272-8(92270)
उवाच चैनं मधुरं नृपं शान्तनवो नृपः।
प्रविशस्व पुरीं राजन्धर्मे च ध्रियतां मनः॥ 13-272-9(92271)
यजस्व विविधैर्यजैर्बह्वन्नैः स्वाप्तदक्षिणैः।
ययातिरिव राजेन्द्र श्रकद्धादमपुरःसरः॥ 13-272-10(92272)
क्षत्रधर्मरतः पार्थ पितॄन्देवांश्च तर्पय।
श्रेयसा योक्ष्यसे चैव व्येतु ते मानसो ज्वरः॥ 13-272-11(92273)
रञ्जयस्व प्रजाः सर्वाः प्रकृतीः परिसान्त्वय।
सुहृदः फलसत्कारैरर्चयस्व यथार्हतः॥ 13-272-12(92274)
अनुं त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृकदस्तथा।
चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजाः॥ 13-272-13(92275)
आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव।
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे॥ 13-272-14(92276)
तथेत्युक्त्वा च कौन्तेयः सोभिवाद्य पितामहम्।
प्रययौ सपरीवारो नगरं नागसाह्वयम्॥ 13-272-15(92277)
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च पतिव्रताम्।
सह तैर्ऋषिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः केशवेन च॥ 13-272-16(92278)
पौरजानपदैश्चैव मन्त्रिवृद्धैश्च पार्थिव।
प्रविवेश कुरुश्रेष्ठः पुरं वारणसाह्वयम्॥ ॥ 13-272-17(92279)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 272 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-272-7 तमिमं पुनरागन्तुमिति थ.पाठः॥

 

अथ भीषस्वर्गारोहणपर्व ॥ 2 ॥


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